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Sunday, February 10, 2013

लहसुन को गरीबों का 'मकरध्वज' कहा जाता है



लहसुन के सेवन से रक्त में थक्का बनने की प्रवृत्ति बेहद कम हो जाती है, जिससे हृदयाघात का ख़तरा टलता है। यह बिंबागुओं (Platelates) को चिपकने से रोकता है। थक्कों को गलाता है। धमनियों को फैलाकर रक्तचाप घटाता है। हाई ब्लड प्रेशर वालों के लिए यह अमृत के समान है। नियमित लहसुन को दूध में उबालकर लेते रहने से ब्लडप्रेशर कम या ज़्यादा होने की बीमारी नहीं होती।
  • कॉलेस्ट्रोल की समस्या से पीड़ित लोगों के लिए लहसुन का नियमित सेवन अमृत साबित हो सकता है। वैज्ञानिकों ने भी इस तथ्य की पुष्टि की है कि लगातार चार हफ्ते तक लहसुन खाने से कॉलेस्ट्रोल का स्तर 12 प्रतिशत तक या उससे भी कम हो सकता है। जिगर के अंदर मेटाबोलिज्म में सुधार लाकर कोलेस्ट्रॉल कम करता है और एरिथमिया को नियमित करता है। 'जर्नल ऑफ न्यूट्रीशन' के एक अध्ययन के मुताबिक लहसुन के सेवन से कोलेस्ट्रॉल में 10 फीसदी गिरावट आती है। यदि रोज नियमित रूप से लहसुन की पाँच कलियाँ खाई जाएँ तो हृदय संबंधी रोग होने की संभावना में कमी आती है।
  • लहसुन की तीक्ष्णता और रोगाणुनाशक विशेषता के कारण यह चिकित्सा जगत में उपयोगी कंद है। मेहनतकश किसान-मजदूर तो लहसुन की चटनी, रोटी खाकर स्वस्थ और कर्मठ बने रहते हैं। षडरस भोजन के 6 रसों में से पाँच रस लहसुन में सदैव विद्यमान रहते हैं। सिर्फ 'अम्ल रस' नहीं रहता। आज षडरस आहार दुर्लभ हो चला है। लहसुन उसकी आपूर्ति के लिए हर कहीं सस्ता, सुलभ है। लहसुन को गरीबों का 'मकरध्वज' कहा जाता है। वह इसलिए कि इसका लगातार प्रयोग मानव जीवन को स्वास्थ्य संवर्धक स्थितियों में रखता है। हेल्थ एक्सपर्ट हर रोज सुबह-उठकर ख़ाली पेट लहसुन की दो-तीन कलियां गुनगुने पानी से लेने की बात कहते हैं।
  • तेज गंध वाली लहसुन एक संजीवनी है जो कैंसर, एड्स और हृदय रोग के विरुद्ध सुरक्षा कवच बन सकती है। त्वचा को दाग़-धब्बे रहित बनाने, मुंहासों से बचने और पेट को साफ़ करने में भी लहसुन बढिय़ा है। इसे बादी कम करने वाला माना जाता है, इसीलिए बैंगन या उड़द की दाल जैसी बादी करने वाली चीजों में इसे डालने की सलाह दी जाती है। यह खून को साफ़ कर शरीर के अंदरूनी सिस्टम की सफाई करता है। अगर आपका वजन अधिक है और इसे कम करना चाहते हैं तो सुबह-शाम लहसुन की दो-दो कलियां खाएं। शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मज़बूत करने, कैंसर, अल्सर और हैमरॉयड से लडऩे में लहसुन को फ़ायदेमंद बताया गया है। इसमें मौजूद सल्फर से एलर्जी महसूस करने वाले इसे न ही खाएं और न ही त्वचा पर लगाएं।

  • लहसुन का पौधा
    हर घर में खाया जाने वाले लहसुन भी ऐसी ही एक गुणकारी दवा है। 'लशति छिंनति रोगान लशुनम्' अर्थात् जो रोग का ध्वंस करे उसे लहसुन (Garlic) कहते हैं। इसे रगोन् भी कहते हैं। लहसुन गुणों से भरपूर भारतीय सब्जियों का स्वाद बढ़ाने वाला ऐसा पदार्थ है जो प्रायः हर घर में इस्तेमाल किया जाता है। ज़्यादातर लोग इसे सिर्फ मसाले के साथ भोजन में ही इस्तेमाल करते हैं। परंतु यह औषधि के रूप में भी उतना ही फ़ायदेमंद है। लहसुन से होने वाले लाभ और इसके चिकित्सीय गुण सदियों पुराने हैं। शोध और अध्ययन बताते हैं कि आज से 5000 वर्ष पहले भी भारत में लहसुन का इस्तेमाल उपचार के लिए किया जाता था। 

पूरी इल्मी जानकारी भारत डिस्कवरी पे -


http://hi.bharatdiscovery.org/india/%E0%A4%B2%E0%A4%B9%E0%A4%B8%E0%A5%81%E0%A4%A8

Friday, February 17, 2012

कब्ज (कांस्टीपेशन) का इलाज.

अनियमित खान-पान के चलते लोगों में कब्ज एक आम बीमारी की तरह प्रचलित है। यह पाचन तन्त्र का प्रमुख विकार है। मनुष्यों मे मल निष्कासन की फ़्रिक्वेन्सी अलग अलग पाई जाती है। किसी को दिन में एक बार मल विसर्जन होता है तो किसी को दिन में २-३ बार होता है। कुछ लोग हफ़्ते में २ य ३ बार मल विसर्जन करते हैं। ज्यादा कठोर,गाढा और सूखा मल जिसको बाहर धकेलने के लिये जोर लगाना पडे यह कब्ज रोग का प्रमुख लक्छण है।ऐसा मल हफ़्ते में ३ से कम दफ़ा आता है और यह इस रोग का दूसरा लक्छण है। कब्ज रोगियों में पेट फ़ूलने की शिकायत भी साथ में देखने को मिलती है। यह रोग किसी व्यक्ति को किसी भी आयु में हो सकता है हो सकता है लेकिन महिलाओं और बुजुर्गों में कब्ज रोग की प्राधानता पाई जाती है।

कब्ज निवारक नुस्खे इस्तेमाल करने से कब्ज का निवारण होता है और कब्ज से होने वाले रोगों से भी बचाव हो जाता है--

१---कब्ज का मूल कारण शरीर मे तरल की कमी होना है। पानी की कमी से आंतों में मल सूख जाता है और मल निष्कासन में जोर लगाना पडता है। अत: कब्ज से परेशान रोगी को दिन मे २४ घंटे मे मौसम के मुताबिक ३ से ५ लिटर पानी पीने की आदत डालना चाहिये। इससे कब्ज रोग निवारण मे बहुत मदद मिलती है।

२...भोजन में रेशे की मात्रा ज्यादा रखने से कब्ज निवारण होता है।हरी पत्तेदार सब्जियों और फ़लों में प्रचुर रेशा पाया जाता है। मेरा सुझाव है कि अपने भोजन मे करीब ७०० ग्राम हरी शाक या फ़ल या दोनो चीजे शामिल करें।

३... सूखा भोजन ना लें। अपने भोजन में तेल और घी की मात्रा का उचित स्तर बनाये रखें। चिकनाई वाले पदार्थ से दस्त साफ़ आती है।

४..पका हुआ बिल्व फ़ल कब्ज के लिये श्रेष्ठ औषधि है। इसे पानी में उबालें। फ़िर मसलकर रस निकालकर नित्य ७ दिन तक पियें। कज मिटेगी।

५.. रात को सोते समय एक गिलास गरम दूध पियें। मल आंतों में चिपक रहा हो तो दूध में ३ -४ चम्मच केस्टर आईल (अरंडी तेल) मिलाकर पीना चाहिये।



६..इसबगोल की की भूसी कब्ज में परम हितकारी है। दूध या पानी के साथ २-३ चम्मच इसबगोल की भूसी रात को सोते वक्त लेना फ़ायदे मंद है। दस्त खुलासा होने लगता है।यह एक कुदरती रेशा है और आंतों की सक्रियता बढाता है।

७..नींबू कब्ज में गुण्कारी है। मामुली गरम जल में एक नींबू निचोडकर दिन में २-३बार पियें। जरूर लाभ होगा।

८..एक गिलास दूध में १-२ चाम्मच घी मिलाकर रात को सोते समय पीने से भी कब्ज रोग का समाधान होता है।

९...एक कप गरम जल मे १ चम्म्च शहद मिलाकर पीने से कब्ज मिटती है। यह मिश्रण दिन मे ३ बार पीना हितकर है।

१०.. जल्दी सुबह उठकर एक लिटर गरम पानी पीकर २-३ किलोमीटर घूमने जाएं। बहुत बढिया उपाय है।

११..दो सेवफ़ल प्रतिदिन खाने से कब्ज में लाभ होता है।

१२..अमरूद और पपीता ये दोनो फ़ल कब्ज रोगी के लिये अमॄत समान है। ये फ़ल दिन मे किसी भी समय खाये जा सकते हैं। इन फ़लों में पर्याप्त रेशा होता है और आंतों को शक्ति देते हैं। मल आसानी से विसर्जीत होता है।

१२..अंगूर मे कब्ज निवारण के गुण हैं । सूखे अंगूर याने किश्मिश पानी में ३ घन्टे गलाकर खाने से आंतों को ताकत मिलती है और दस्त आसानी से आती है। जब तक बाजार मे अंगूर मिलें नियमित रूप से उपयोग करते रहें।

13..एक और बढिया तरीका है। अलसी के बीज का मिक्सर में पावडर बनालें। एक गिलास पानी मे २० ग्राम के करीब यह पावडर डालें और ३-४ घन्टे तक गलने के बाद छानकर यह पानी पी जाएं। बेहद उपकारी ईलाज है।

१४.. पालक का रस या पालक कच्चा खाने से कब्ज नाश होता है। एक गिलास पालक का रस रोज पीना उत्तम है। पुरानी कब्ज भी इस सरल उपचार से मिट जाती है।

१५.. अंजीर कब्ज हरण फ़ल है। ३-४ अंजीर फ़ल रात भर पानी में गलावें। सुबह खाएं। आंतों को गतिमान कर कब्ज का निवारण होता है।

16.. मुनका में कब्ज नष्ट करने के तत्व हैं। ७ नग मुनक्का रोजाना रात को सोते वक्त लेने से कब्ज रोग का स्थाई समाधान हो जाता है।
‘जान है जहान है‘ ब्लॉग से शुक्रिया के साथ पेश है.

Friday, November 25, 2011

गर्भाशय कैंसर से बचाते हैं बच्चे !


ऐसी महिलाओं में गर्भाशय कैंसर के मामले बढ़ते जा रहे हैं जिनके या तो कम बच्चे हैं या फिर बच्चे हैं ही नहीं। वर्तमान में प्रतिवर्ष 7,530 महिलाओं में गर्भाशय कैंसर की पुष्टि होती है जबकि 1975 में यह संख्या 4,175 थी।

समाचार पत्र 'डेली मेल' के मुताबिक चिकित्सकों का कहना है कि महिलाओं का अपने करियर में आगे बढ़ने की वजह से बच्चों को जन्म नहीं देना या कम बच्चों पैदा करना गर्भाशय कैंसर के मामले बढ़ने का मुख्य कारण है।

Monday, November 21, 2011

Tuesday, November 15, 2011

पहले से ज्यादा मांस खा रहे हैं भारतीय


 

बदलते वक्त के साथ भारत में खाने में मांस का इस्तेमाल भी बढ़ा है. पहले जहां लोग भैंस या गाय का मांस नहीं खाते थे वहीं अब शौक के लिए भी लोग खा रहे हैं. बड़े रेस्तरां में सूअर और गोमांस मिलने लगा है.

 
धार्मिक मनाही और शाकाहारी संस्कृति के बावजूद भारतीय पहले से अधिक मांस का इस्तेमाल करने लगे हैं. आहार के बदलाव और हाइजीन प्रक्रिया उन्नत होने से ऐसे बदलाव हो रहे हैं. संयुक्त राष्ट्र की खाद्य और कृषि संगठन यानि एफएओ कहती है कि भारत में मांस की प्रति व्यक्ति खपत 5 से लेकर 5.5 किलोग्राम सालाना हो गई है.
रिकॉर्ड संकलन शुरू होने के बाद से यह सबसे उच्चतम है. इससे पता चलता है कि विकासशील देशों में प्रोटीन युक्त आहार की तरफ लोगों का झुकाव हो रहा है.जानकार कहते हैं कि आर्थिक विकास की वजह से तेजी से अमीर हो रहे लोग, देश विदेश यात्रा कर चुके लोगों के कारण से मांस के इस्तेमाल में तेजी आ रही है. मांस के ज्यादा उपयोग होने से रेस्तरां और सुपरमार्केट के पास उपभोक्ताओं को देने के लिए विभिन्न प्रकार के उत्पाद हैं. 
वक्त के साथ स्वाद बदला
मुंबई के एक मशहूर विदेशी व्यंजन रेस्तरां के जयदीप मुखर्जी कहते हैं, "संकोच को हटाकर भारतीय अब ज्यादा साहसिक हो रहे हैं. भैंसों और सूअर के मांस का टिक्का लोग पसंद कर रहे हैं." अब यह रेस्तरां ऐसे सप्लायर की तलाश में हैं जो इसके फिनिक्स मिल शॉपिंग मॉल में स्थित रेस्तरां के लिए तीतर, बटेर और बतख का मांस दे सके.
फूड चेन नेचर्स बास्केट के मैनेजिंग डायरेक्टर मोहित खट्टर कहते हैं, "जहां पहले मांस के उपयोग के लिए माता पिता की मंजूरी चाहिए होती थी, अब पश्चिमी देशों का प्रभाव और उदार दृष्टिकोण की वजह से लोग मांस खाने लगे हैं." खट्टर के मुताबिक मांसाहारी होना अब भोग विलास नहीं रहा. घरेलू मांस उत्पादन में सुधार हुआ है और अब हाइजीन प्रक्रिया होने की वजह से ग्राहकों का विश्वास भी बढ़ा है. एफएओ के मुताबिक भारत में सालाना 1.06 करोड़ टन मांस और मछली का उत्पादन होता है, लेकिन  देश में अभी भी शाकाहारी लोगों की संख्या कहीं अधिक है.
गाय और सुअर के मांस का चलन बढ़ा   
देश में कितने शाकाहारी हैं इसका कोई सरकारी आंकड़ा नहीं है. लेकिन 2006 में द हिंदू अखबार ने देशभर में एक सर्वे कराया. सर्वे से पता चला कि देश की 40 फीसदी आबादी डेयरी उत्पादों और अंडों का इस्तेमाल करती हैं लेकिन मांस का इस्तेमाल नहीं करती. भारत में हिंदू धर्म में गाय की पूजा होती है. इस वजह से भारत के कई राज्यों में गाय के वध पर पाबंदी है. फास्ट फूड विक्रेता मैकडोनाल्ड भारत में बीफ बर्गर नहीं बेचता है.
यहां तक की हाउसिंग सोसाइटी उन लोगों को मकान किराये पर या नहीं बेचती हैं जो मांसाहारी होते हैं. अमेरिका स्थित खाद्य और कृषि नीति अनुसंधान संस्थान के मुताबिक भारत में दस पहले जहां ब्रॉयलर चिकन की प्रति व्यक्ति खपत करीब 1 किलोग्राम थी वही अब बढ़कर 2.26 किलोग्राम हो गई है. मांस का बड़े पैमाने में मिलना अजय मुखोपाध्याय जैसे लोगों के लिए वारदान साबित हो रहा है. 39 वर्षीय मुखोपाध्याय को बीफ करी बेहद पसंद है.
मुखोपाध्याय  कहते हैं, "मुझे भुना हुआ गोमांस पसंद है. वह रसदार और लजीज होता है." एशिया के मुकाबले भारत में प्रति व्यक्ति मांस की खपत औसतन कम है. एशिया में औसतन 27 किलोग्राम प्रति व्यक्ति खपत होती है. एफएओ के मुताबिक बाकी दुनिया में हर साल 38 किलोग्राम प्रति व्यक्ति खपत होती है.
रिपोर्ट:एएफपी/आमिर अंसारी
संपादन:एस गौड़
बशुक्रिया -  http://www.dw-world.de/dw/article/0,,15238044,00.html

Thursday, November 10, 2011

क्या आप मूत्र पीने के शौक़ीन हैं ?


मल मूत्र का नाम आते ही आदमी घृणा से नाक भौं सिकोड़ने लगता है लेकिन ऐसे लोगों की संख्या करोड़ों में है जो कि मूत्र पीते हैं।
मूत्र पीने को आजकल बाक़ायदा एक थेरेपी के रूप में भी प्रचारित किया जाता है।
मूत्र का सेवन करने वालों में आज केवल अनपढ़ और अंधविश्वासी जनता ही नहीं है बल्कि बहुत से उच्च शिक्षित लोग भी हैं और ऐसे लोग भी हैं जो कि दूसरे समुदाय के लोगों को आए दिन यह समझाते रहते हैं कि उन्हें क्या खाना चाहिए और क्या नहीं खाना चाहिए लेकिन खुद कभी अपने पीने पर ध्यान नहीं देते कि वे क्या पी रहे हैं और क्यों पी रहे हैं ?
बहरहाल यह दुनिया है और यहां रंग बिरंगे लोग हैं।
सबकी अक्ल और सबकी पसंद अलग अलग है।
जो लोग पेशाब पीते हैं , उन्हें भला कौन रोक सकता है ?
देखिए एक लिंक -


(Coen Van Der Kroon) 
Urine therapy consists of two parts: internal appication (drinking urine) and external application (massaging with urine). Both aspects comple-ment each other and are important for optimal results. The basic principle of urine therapy is therefore quite simple: you drink and massage yourself with urine. Even so, there are a number of different ways to apply urine therapy. After your initial experiences, you will be able to determine. Throughout the civilized world, blood and blood products are used in the medical world without evoking the repugnance associated with urine. We often use prepacked cells, plasma, white blood cells and countless other blood components. Urine is nothing other than a blood product. 

Wednesday, November 9, 2011

मैदानी क्षेत्रों में मांस क्यों खाया जाए ?


हिंदू भाई बहनों में कुछ जो शाकाहारी हैं, वे ये सवाल अक्सर पूछते हैं। उनके सवालों का जवाब देती है यह पोस्ट

बौद्धिक बौनेपन का ख़तरा 


इसे पढ़कर आपकी  तसल्ली ज़रूर हो जाएगी।

Tuesday, November 8, 2011

विज्ञान के युग क़ुरबानी पर ऐतराज़ क्यों ?

ZEAL: ईद मुबारक
विज्ञान के युग क़ुरबानी पर ऐतराज़ क्यों ?
ब्लॉगर्स मीट वीकली 16 में यह शीर्षक देखकर लिंक पर गया तो उन सारे सवालों के जवाब मिल गए जो कि क़ुरबानी और मांसाहार पर अक्सर हिंदू भाई बहनों की तरफ़ से उठाए जाते हैं।
पता यह चला कि अज्ञानतावश कुछ लोगों ने यह समझ रखा है कि फल, सब्ज़ी खाना जीव को मारना नहीं है। जबकि ये सभी जीवित होते हैं और इनकी फ़सल को पैदा करने के लिए जो हल खेत में चलाया जाता है उससे भी चूहे, केंचुए और बहुत से जीव मारे जाते हैं और बहुत से कीटनाशक भी फ़सल की रक्षा के लिए छिड़के जाते हैं।
ये लोग दूध, दही और शहद भी बेहिचक खाते हैं और मक्खी मच्छर भी मारते रहते हैं और ये सब कुकर्म करने के बाद भी दयालुपने का ढोंग रचाए घूमते रहते हैं।
यह बात समझ में नहीं आती कि जब ये पाखंडी लोग ये नहीं चाहते कि कोई इनके धर्म की आलोचना करे तो फिर ये हर साल क़ुरबानी पर फ़िज़ूल के ऐतराज़ क्यों जताते रहते हैं ?
अपने दिल में ये लोग जानते हैं कि हमारी इस बकवास से खुद हमारे ही धर्म के सभी लोग सहमत नहीं हैं। इसीलिए ये लोग कमेंट का ऑप्शन भी बंद कर देते हैं ताकि कोई इनकी ग़लत बात को ग़लत भी न कह सके।
सचमुच यह लेख बहुत अच्छा है,

Tuesday, August 23, 2011

आब ए ज़म ज़म की ख़ूबियां


आज आब ए ज़म ज़म की एक और ही विशेषता के बारे में जानने का मौक़ा हमें तब मिला जबकि हम देखने के लिए तो गए तो कुछ और मिल गई यह पोस्ट ,
आप भी देखें और इसे अपने मुसलमान दोस्तो को इसकी जानकारी दें।

करिश्माई है आब ए जमजम



Friday, August 12, 2011

क्या आप सूअर की चर्बी खा रहे हैं ?

बी. एस. पाबला  जी का लेख देख कर मन में यही विचार आया, क्योंकि हम तो लेज़ खाते नहीं हैं और हो सकता है कि दूसरे प्रोडक्ट्स में E 631 हम भी खा रहे हों जो कि हक़ीक़त में सूअर की चर्बी का कोड है .
यूरोप और अमेरिका में जा बसे हिन्दू मुसलमान कहाँ तक बच पाते होंगे सूअर की चर्बी से .
मुस्लिम देशों में इसे गाय या भेड़ की चर्बी कह प्रचारित किया गया लेकिन इसके हलाल न होने से असंतोष थमा नहीं और इसे प्रतिबंधित कर दिया गया। बहुराष्ट्रीय कंपनियों की नींद उड़ गई। आखिर उनका 75 प्रतिशत कमाई मारी जा रही थी इन बातों से। हार कर एक राह निकाली गई। अब गुप्त संकेतो वाली भाषा का उपयोग करने की सोची गई जिसे केवल संबंधित विभाग ही जानें कि यह क्या है! आम उपभोक्ता अनजान रह सब हजम करता रहे। तब जनम हुआ E कोड का
तब से यह E631 पदार्थ कई चीजों में उपयोग किया जाने लगा जिसमे मुख्य हैं टूथपेस्ट, शेविंग क्रीम, च्युंग गम, चॉकलेट, मिठाई, बिस्कुट, कोर्न फ्लैक्स, टॉफी, डिब्बाबंद खाद्य पदार्थ आदि। सूची में और भी नाम हो सकते हैं। हाँ, कुछ मल्टी-विटामिन की गोलियों में भी यह पदार्थ होता है। शिशुयों, किशोरों सहित अस्थमा और गठिया के रोगियों को इस E631 पदार्थ मिश्रित सामग्री को उपयोग नहीं करने की सलाह है लेकिन कम्पनियाँ कहती हैं कि इसकी कम मात्रा होने से कुछ नहीं होता।
पिछले वर्ष खुशदीप सहगल जी ने एक पोस्ट में बताया था कि कुरकुरे में प्लास्टिक होने की खबर है चाहें तो एक दो टुकड़ों को जला कर देख लें। मैंने वैसा किया और पिघलते टपकते कुरकुरे को देख हैरान हो गया। अब लग रहा कि कहीं वह चर्बी का प्रभाव तो नहीं था!?
अब बताया तो यही जा रहा है कि जहां भी किसी पदार्थ पर लिखा दिखे
E100, E110, E120, E 140, E141, E153, E210, E213, E214, E216, E234, E252,E270, E280, E325, E326, E327, E334, E335, E336, E337, E422, E430, E431, E432, E433, E434, E435, E436, E440, E470, E471, E472, E473, E474, E475,E476, E477, E478, E481, E482, E483, E491, E492, E493, E494, E495, E542,E570, E572, E631, E635, E904
समझ लीजिए कि उसमे सूअर की चर्बी है।
और कुछ जानना हो कि किस कोड वाल़े पदार्थ का उपयोग करने से किसे बचना चाहिए तो यह सूची देख लें
कैसी रही?
पूरा मज़मून यहाँ है - http://www.haaram.com/CompleteArticle.aspx?aid=312929&ln=hi